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- Bharat Solanki
- Bharat Solanki,the Author & Publisher of SUDARSHANAM which reveals The History & Individual Development of Marwari Rajasthani People from Bagol Past till Present.
Saturday, February 2, 2013
डीजल-पेट्रोल के दाम,सोने का आयात, महंगाई और हमारी युवा पीढ़ी
Tuesday, December 13, 2011
Saturday, May 29, 2010
SYSTEMATIC INVESTMENT PLAN - SIP
सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान सिप क्या है ?
सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानि सिप नियमित रूप से निवेश के सिद्धांत पर काम करता है। यह आपके आवर्ती जमा की तरह है जिसमें आप हर महिने कुछ छोटी राशि डालते हैं।
ये आपको एक बार में भारी पैसा निवेश करने की जगह म्यूचुअल फंड में कम अवधि का (मासिक या त्रैमासिक) निवेश करने की आजादी देता है। SIP आपको एक म्युचुअल फंड में एकसाथ 5,000 रूपये के निवेश की बजाय 500 रूपये के 10 बंटे हुये निवेश की सुविधा देता है । इससे आप अपनी अन्य वित्तीय जिम्मेदारियों को प्रभावित किये बिना म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं। SIP कैसे काम करता है ये बेहतर समझने के लिये आपको Rupee cost averaging और धन के जुङते रहने की शक्ति (power of compounding) को समझना जरूरी है। SIP एक औसत आदमी की पहुंच के करीब म्यूचुअल फंड निवेश को ले आया है क्योंकि यह उन तंग बजट लोगों को भी निवेश करने योग्य बनाता है जो एक बार में बङा निवेश करने के बजाय 500 या 1,000 रूपये नियमित रूप से निवेश कर सकते हैं।
SIP के माध्यम से छोटी छोटी बचत करना शायद पहली बार में आकर्षक न लगे लेकिन ये निवेशकों को बचत की आदत डालता है और बढते वर्षों में ये आपको सुंदर प्रतिलाभ (रिटर्न) देते हैं। 2,000 रूपये महिने का एक SIP का धन 20% की दर से 10 वर्षों में बढकर 6.88 लाख रूपये, 20 साल में 49.52 लाख रूपये और 25 साल में 125.20 लाख तक हो सकता है। यही नही धनी लोगों को भी ये गलत समय और गलत जगह पर निवेश करने की आशंका से बचाता है। हांलाकि SIP का असली फायदा निचले स्तर पर निवेश करने से मिलता है।
SIP के अन्य लाभों में शामिल हैं—
अनुशासित निवेश-अपने धन कोष को सुरक्षित बनाये रखने के तीन मुख्य नियम हैं- निवेश जल्दी शुरू करे,सही एस्सेट क्लास चुने और लगातार नियमित निवेश करें । अपने निवेशों पर ध्यान केन्द्रित रखें और अपने निवेश के तरीके में अनुशासन बनाये रखें। हर महिने कुछ राशि अलग निकालने से आपकी मासिक आमदनी पर अधिक अन्तर नही पङेगा। आपके लिये भी बङे निवेश हेतु इकट्ठा पैसा निकालने से बेहतर होगा कि हर महिने कुछ रूपये बचाये जायें। जंहा आठ प्रतिशत की गारंटी वाली इस्किम में पांच हजार प्रति माह के बतीश साल में 19.20 लाख के निवेश पर सिर्फ 84 लाख बनता हैं तो राइट अस्सेट क्लास में निवेश करने पर बीस प्रतिशत की दर से 11.3 करोड़ का फंड बनता हैं।
रूपये के जुङते रहने की शक्ति [Power of Compounding] हर एक व्यक्ति को हमेशा जल्दी निवेश शुरू करना चाहिये इसका एक मुख्य कारण है चक्रवृद्धि ब्याज मिलने का लाभ। चलिये इसे एक उदाहरण से जानें। राम 25 साल की उम्र से 5,000 रूपये हर माह बचाना शुरू करता है,वहीं श्याम 10000 रुपये बचाता है लेकिन 40 साल की आयु से। जब 60 साल की उम्र में दोनों अपना निवेश किया हुआ पैसा प्राप्त करते हैं तो राम का फंड 5.71 करोड़ होता है जबकि श्याम को केवल 1.33 करोड़ । इस उदाहरण में हम देख सकते हैं की राम ने सिर्फ 21 लाख जबकि श्याम ने 24 लाख के निवेश के बावजूद राम को अधिक धन मिलता हैं । तो ये साफ है कि शुरू में किया गया निवेश का फर्क आखिरी फंड पर चार करोड़ से ज्यादा का प्रभाव डालता है। ये रूपये के जुङते रहने की शक्ति (Power of compounding) के कारण होता है। जितना लंबा समय आप निवेश करेंगे उतना ज्यादा आपको रिटर्न मिलेगा। इससे पता चलता है कि देर से निवेश करने में समान धन डालने पर भी व्यक्ति शुरू में मिलने वाले चक्रवृद्धि ब्याज के फायदे को खो देता है।
रूपये की कीमत का औसत( Rupee Cost Averaging) ये मुख्य रूप से शेयरों में निवेश के लिये उपयोगी है। जब आप एक फंड में लगातार अंतराल पर समान धन का निवेश करते हैं तो रूपये की कम कीमत के समय में आप शेयर की ज्यादा यूनिट खरीदते हैं। इस प्रकार समय के साथ आपकी प्रति यूनिट औसत कीमत कम होती जाती है। यह रूपये की औसत लागत की नीति होती है जो एक लंबी अवधि के समझदार निवेश के लिये बनाई गयी है। ये सुविधा अस्थिर बाजार में निवेश के खतरे को कम करती है और बाजार के उतार चढाव भरे सफर में आपको सहज बनाये रखती है। जो लोग SIP के माध्यम से निवेश करते हैं वे बाजार के उतार के समय को भी उतनी ही अच्छी तरह संभाल सकते हैं जैसे वो बाजार के चढाव के समय को। SIP के द्वारा आप के निवेश की औसत लागत कम होती है , तब भी जब आप बाजार के उँचे या नीचे सभी प्रकार के दौर से गुजरते हैं।
सुविधाजनक: ये निवेश का बहुत ही आसान तरीका है। आपको केवल पूरे भरे हुये नामांकन फॉर्म के साथ एक चेक और ऑटो डेबिट ईसीएस फॉर्म म्यूचु्अल फंड में जमा करना होगा जिससे आपके द्वारा तय तारीख पर हर माह निश्चित राशि आपके बैंक खाते से डेबिट हो जायेगी और आपके फंड खाते में शेयर यूनिट आ जायेंगी ।इसके लिए आप अधिकृत वितीय सलाहकार की सेवा भी ले सकते हैं ।
अन्य लाभ• SIP निवेश में पैसा डालने या निकालने पर कोई टैक्स या शुल्क नही है। इसमें कैपिटल गेन पर लगने वाला टैक्स (जहां भी लागू होता है) निवेश करने के समय अवधि पर निर्भर होता है।
Thursday, May 6, 2010
पीपीएफ और बीमा में ज्यादा निवेश तो नहीं कर रहे आप
मैं 40 साल का हूं और मेरी दस साल की बेटी है। मैं उदयपुर की एक निजी कंपनी में काम कर रहा हूं और सालाना 4 लाख का वेतन पाता हूं। मेरे ऊपर 6 लाख रुपए का फ्लोटिंग ब्याज दर वाला कर्ज है।
मेरे खर्च इस प्रकार हैं-
परिवार के खर्च : 1.2 लाख रुपए सालाना
ईएमआई हाउसिंग लोन : 90,000 रुपए सालाना
मेरे निवेश इस प्रकार हैं
एलआईसी, पीपीएफ : एक लाख रुपए सालाना
मेरी आशंकाएं-
शेयरों में धन लगाने को लेकर मुझे डर रहता है
मेरे पास आय का दूसरा कोई स्रोत नहीं है
मेरे संदेह-
अगले 10-15 साल में कहां निवेश करूं ताकि सेवानिवृत्ति के बाद मेरे पास पर्याप्त धन हो जाए।
-धीरज कुमार, उदयपुर
आप अपने हाउसिंग लोन या घरेलू खर्च को लेकर समझौता नहीं कर सकते। अब हमारे पास जीवन बीमा (एलआईसी) और पीपीएफ ऐसे निवेश विकल्प हैं, जिसकी पुनररचना की जा सकती है। मेरी राय में तो आप एलआईसी और पीपीएफ में आप अपनी आय के हिसाब से ज्यादा निवेश कर रहे हैं।हमें यह पता नहीं है कि आप एक लाख रुपए सालाना की निर्धारित रकम में से कितना पीपीएफ में निवेश कर रहे हैं और एलआईसी में कितना धन लगा रहे हैं। आइए इन प्रकरणों का अध्ययन करें-
केस 1 : अगर आप पीपीएफ में ज्यादा निवेश कर रहे हैं।
आपकी स्थिति संभल सकती है। पीपीएफ एक अच्छा निवेश है लेकिन इस पर केवल आठ फीसदी प्रतिफल मिलता है। जबकि दौलत कमाना है तो आपकी रणनीति बदलनी होगी। आप और भी ज्यादा प्रतिफल कमा सकते हैं अगर आप सेवानिवृत्ति का विकल्प ध्यान में रखें।
मेरे सुझाव इस प्रकार हैं
साजिद फ्लेक्सवाला का जवाबः
1. एलआईसी को छोड़कर बाकी सभी 80 सी के योगदान बंद कर दीजिए ।
2. पीपीएफ खाते को जीवित रखने के लिए हर साल 1,000 रुपए जमा कीजिए ।
3. म्यूचुअल फंडों की इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) में निवेश के लिए बाकी धन (एलआईसी प्रीमियम और 1,000 रुपए पीपीएफ हटाने के बाद एक लाख रुपए में से बची शेष राशि) का इस्तेमाल कीजिए। आपके पास 3 साल का लॉक इन होगा। आप 5-7 साल में अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे।
केस 2 : अगर आप बीमे में बहुत ज्यादा निवेश कर रहे हैं
मान लें कि आपकी पालिसी का चुकारा हो चुका है (यानी आप अपनी पालिसी के तीन साल पहले ही पूरे कर चुके हैं) अगर तीन साल से कम अवधि है तो मानलें कि तीन साल पूरे होने तक आपको भुगतान करना है। आपको एक विशेषज्ञ की राय इसमें लेनी चाहिए क्योंकि बीमा की राशि और प्रीमियम आदि मसले इसमें प्रभावी होते हैं। आपकी उम्र में 10 लाख रुपए की जीवन बीमा पालिसी में 5,000 से 6,000 रुपए सालाना से ज्यादा की लागत नहीं आनी चाहिए। मैं इस मामले में सावधि पालिसी का सुझाव दूंगा। बीमा के लिहाज से आदर्श स्तर 30 लाख रुपए है।
आपको कहां निवेश करना चाहिए?
आपका आयकर 25,000 रुपए सालाना की रेंज में रहेगा। आपकी देनदारियों को देखते हुए लगता है कि आपके खर्च निकालने और सेक्शन 80सी में निवेश के बाद 7,000-8,000 रुपए हर महीने बचा सकते हैं। आपको सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट प्लानिंग (एसआईपी) का इस्तेमाल इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए करना चाहिए। अगर आप 8,000 रुपए प्रति माह निवेश करते हैं तो आपके पास 15 साल में 54 लाख रुपए [इक्विटी निवेश में 15 फीसदी प्रतिफल की दर से हिसाब लगाएं] होंगे। अगर आपको बोनस या वेतनवृद्धि मिलती है तो आप कुछ ब्लूचिप कंपिनयों में निवेश कर सकते हैं। इस बुनियादी नियम का पालन करिए। पंद्रह साल में आपके पास बड़ी रकम होगी। सेक्शन 80सी में निवेश करके आप टैक्स बचा सकते हैं और इससे आपको बच्चो की उच्च शिक्षा और विवाह जैसी जिम्मेदारियों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। सोना, रीयल एस्टेट जैसे विकल्पों को जीवन के उत्तरार्ध में अपनाना चाहिए।
Guide For Mutual Fund Investor
म्यूचु्अल फंड निवेशकों के लिये कुछ सुझाव
पहली बार म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले निवेशकों को अधूरी जानकारी होती है और ज्यादातर वे निवेश की परिस्थितियों में आने वाली अनिश्चितताओं से प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन म्यूचुअल फंड निवेश में बाजार के समय से भी अधिक महत्वपूर्ण बातें हैं जो ध्यान रखनी चाहिये।सबसे पहले ध्यान रखे
एक महत्वाकांक्षी यूनिट धारक को सबसे पहले ये तय करना चाहिये कि वो किस तरह के पोर्टफोलियो (निवेश सूची) का निर्माण करना चाहता है। दूसरे शब्दों में उसे अपनी सम्पत्ति के सही विनियोजन का फैसला करना चाहिये।ये ऐसेट एलोकेशन (asset allocation) कहलाता है। ऐसेट एलोकेशन वो तरीका है जो ये निर्धारित करता है कि आप अपने पैसे को विभिन्न निवेशों में कैसे लगायें जिसमें सम्पत्ति के सभी वर्गों का उचित मिश्रण हो।
ऐसेट एलोकेशन के लोकप्रिय नियम कहते हैं कि निवेशक की जो भी उम्र हो,उसे अपने पोर्टफोलियो में अपनी उम्र जितना धन प्रतिशत रखना चाहिये। उदाहरण के लिये- यदि निवेशक की उम्र 25 साल है तो उसे अपने निवेश का 25% ऋण (debt instrument) में और शेष इक्विटी में लगाना चाहिये।
हालांकि वास्तविकता में, प्रत्येक व्यक्ति की विभिन्न परिस्थितियों और वित्तीय हालत के अनुसार अलग अलग निवेश आवंटन की जरूरत हो सकती है। ऐसेट एलोकेशन को समझने के लिये आपको विभिन्न कारको की भी जानकारी होनी चाहिये जैसे-आयु, व्यवसाय, आप पर निर्भर परिवार के सदस्यों की संख्या आदि। सामान्यतः जितने अधिक आप युवा हैं उतने ही जोखिम भरे निवेश आप रख सकते हैं जिनसे आपको बेहतर रिटर्न मिले।
सही फंड कैसे चुनें
सही फंड चुनने के लिये ध्यान रखें— कि सही फंड चुनने की कुंजी उनके निवेश सिद्धांत और रिटर्न देने की स्थिरता पर निर्भर करती है। आप सही फंड चुनें जो आपकी जरुरतों के लिये उपयुक्त हो, ये सुनिश्चित करने के लिये निम्न बातों पर विचार करें:
• अपने आर्थिक लक्ष्यों को निर्धारित करें।
• क्या आप अपनी सेवानिवृत्ति के लिये निवेश कर रहे हैं ?य़ा अपने बच्चे की शिक्षा के लिय ?, या फिर वर्तमान आमदनी के लिये ?
• अपनी समय सीमा पर विचार करें। क्या आपको तीन महिने के समय में पैसा चाहिये या फिर तीन साल में ? , जितना विस्तृत आपका समय होगा उतना ज्यादा जोखिम आप निवेश में उठाने के काबिल होंगे।
• आप जोखिम उठाने के बारे में क्या सोचते हैं ? क्या आप उच्च रिटर्न की संभावना के लिये शेयर बाजार के उतार चढाव को बर्दाश्त करने की स्थिति में हैं? आपको अपने स्वंय की जोखिम उठाने की क्षमता के बारे में अवश्य पता होना चाहिये,यह सही निवेश योजना को चुनने के लिये एक गाइड हो सकता है। याद रखें,संभावित रिटर्न की चिन्ता किये बिना यदि आप किसी विशेष परिसंपत्ति वर्ग के साथ सहज नही हैं तो आपको अन्य निवेश विकल्पों पर विचार करना चाहिये।
• ध्यान रखें-इन सभी कारकों का सीधा प्रभाव उन फंड पर पङता है जिन्हें आप चुनते हैं और जो रिटर्न आप प्राप्त करने की उम्मीद रखते हैं।
फंड कैन्डी • विविध इक्विटी फंड
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अगर आप जोखिम उठाने की हिम्मत के साथ एक लंबी अवधि के निवेशक हैं और मुद्रास्फीति को हराने के लिये रिटर्न की तलाश में हैं तो इक्विटी फंड सर्वोच्च चुनाव है। म्यूचुअल फंड विभिन्न प्रकार की इक्विटी और इक्विटी आधारित योजनाओं (देखें फंड कैन्डी) को पेश करता है। शुरूआत में विविध फंड के साथ निवेश करना उचित होगा और धीरे धीरे आप ऋण जोखिम के क्षेत्र और विशेष फंड में भी हाथ आजमा सकते हैं।
नजर रखें
सिर्फ आवेदन फॉर्म भर देना और चेक लिखना ही काफी नही है। आपके निवेश कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं , इस पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी है। एक योग्य और पेशेवर निवेश सलाहकार जो आपको सही निर्णय लेने और आपके निवेशों के प्रदर्शन के मापने दोनों में सहायता कर सकता है। साथ ही आपको ये भी जानना चाहिये कि आप खुद की छोटी सी मदद निम्न स्त्रोतों के द्वारा कैसे कर सकते हैं।
फैक्ट शीट और न्यूजलैटर
म्यूचुअल फंड मासिक और त्रैमासिक फैक्ट शीट और न्यूजलैटर प्रकाशित करते हैं जिनमें पोर्टफोलियो की जानकारी ,फंड मैनेजर द्वारा प्रबंधित योजनाओं और उनके प्रदर्शन आंकङों की रिपोर्ट प्रकाशित होती है।
वेबसाइट
म्यूचुअल फंड की वेबसाइट प्रदर्शन आंकङे , दैनिक NAV (नेट ऐसेट वैल्यू) , फंड फैक्ट शीट , त्रैमासिक न्यूजलैटर और प्रेस क्लिपिंग इत्यादि उपलब्ध कराती है। इसके अलावा भारत में म्यूचुअल फंड एसोसियेशन( AMFI ) की वेबसाइट भी है जिसमें दैनिक और ऐतिहासिक NAV और अन्य योजनाओं के बारे में सूचना होती हैं।
समाचार पत्र
समाचार पत्र के पृष्ठों में म्यूचुअल फंड योजनाओं की बिक्री , NAV और रिडेम्पशन मूल्य की जानकारी होती है। इसके अलावा अन्य आर्थिक विश्लेषण और रिपोर्ट भी होती हैं।
याद रखें
Friday, April 16, 2010
मेडिक्लेम का कार्ड सिर्फ दिखावा
आपकी जेब में रखा हुआ मेडिक्लेम का कार्ड कहीं सिर्फ दिखावा भर न साबित हो। हो सकता है, जब आपको इसकी जरूरत पड़े, तब आपको बीमा कंपनी क्लेम ही न दे। हकीकत में जिस तेजी से हेल्थ इंश्योरेंस का चलन बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से दावे खारिज होने का औसत भी बढ़ रहा है। लगातार ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, जिसमें बीमा कंपनियां क्लेम का भुगतान नहीं करती हैं। ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पॉलिसीधारक बीमा कराने के बाद खुद को निशिंचत समझता है। पर उसे हकीकत का अंदाजा तब होता है, जब बीमारी सामने आती है और वो अस्पताल में भर्ती होता है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें पॉलिसीधारक बड़ी उम्मीद से भर्ती होता है। पर जैसे ही उसके केस को टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) के पास भेजा जाता है, उसका दावा खारिज कर दिया जाता है।
सेहत के बार में बताएं: वास्तव में तो मेडिक्लेम का कार्ड सिर्फ एक परिचय पत्र के अलावा और कुछ भी नहीं हैं दावे का भुगतान या केश लेश की सुविधा पोलिसी की वैधता पर निर्भर करती हैं। इसके लिए आपके द्वारा पोलिसी लेते वक्त प्रस्ताव पत्र में दिए गए सवालो के जवाब और रेनेवल चेक के भुगतान की प्रमाणिकता यानि आपकी बैंक पास बुक स्टेटमेंट की कोपी। कई बार ऐसा होता हैं की आप प्रस्ताव पत्र भरते समय जवाब में लिखते हैं मुझे कोई बीमारी पूर्व में नहीं हुई थी पर जब आप हॉस्पिटल में भरती होते हैं तब आप अपने डॉक्टर को अपनी पूर्व बीमारियों का ब्यौरा जरुर लिखवाते हैं ध्यान रहे बीमा कम्पनी और पोलिसीधारक के बीच, आपके द्वारा दिए गए सत्य कथनों पर आधारित एक अनुबंध ही आपकी पोलिसी दस्तावेज हैं। आपको अपनी मेडिकल हिस्ट्री बीमा कंपनी से छिपानी नहीं चाहिए। इसका आगे चलकर बड़ा फायदा मिलता है। ज्यादातर कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी करते वक्त मेडिकल चेकअप को तरजीह नहीं देती हैं। ऐसे में ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप बीमा कंपनी को बता दें कि आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं या फिर आपको फला बीमारी है। आप ये भी कर सकते हैं कि उस कंपनी की ऐसी पॉलिसी खरीदें, जिसमें मेडिकल टेस्ट जरूरी हो।कंपनियों का रवैया ठीक नहीं: जानकार लोगो के मुताबिक बीमा कंपनियों का रवैया हमारे देश में अच्छा नहीं है। हमारे यहां इन चीजों पर कोई ध्यान भी नहीं दे रहा है। दरअसल हेल्थ इंश्योरेंस का कांसेप्ट हमारे यहां पश्चिमी देशों से आया है। वहां ज्यादातर पॉलिसीधारक और बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं। पॉलिसीधारक जहां अपनी पूर्व की बीमारियों का खुलासा कर देते हैं, वहीं बीमा कंपनियां क्लेम को मंजूर करने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रयास करती हैं। पर हमारे यहां अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी किसी भी शख्स को सेहत का बीमा कराने से पहले कुछ बातों को जेहन में रखना चाहिए। सच्चाई को किसी भी सूरत में छिपाना नहीं चाहिए।
भर्ती होना जरूरी : अधिकतर बीमा कंपनियां किसी भी मेडिक्लेम के लिए कम से कम 24 घंटे भर्ती होना जरूरी मानती हैं। परन्तु मोतिया बिंदु, हर्निया, एपेंड़ेक्स, हैड्रोसिल,स्टोन रेमोवल,पाइल्स, कोरोनरी एन्जिओग्राफी एन्जिओप्लासटी आदि बहुतसी सर्जरी चिकित्सा जिसमे अनावश्यक 24 घंटे भरती रहना जरुरी नहीं हैं इसके लिए बिमा कंपनी एवं टी पी ए द्वारा अथवा पालिसी दस्तावेज में दर्ज चिकित्सा सूचि को देखना जरुरी हैं । अगर पॉलिसीधारक पॉलिसी खरीदने के शुरुआती 30 दिनों में आकस्मिक दुर्घटना के अलावा किसी अन्य बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होता है तो होने वाले खर्च के लिए बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी। इसके साथ ही पहले से चली आ रही बीमारियों का खर्च भी बीमा कंपनियां नहीं उठाती हैं। हालांकि कुछ सर्जिकल बीमारियां पॉलिसी लेने के दो और चार साल बाद कवर की जाती हैं।
बीमा राशि: योजना के तहत बीमा कंपनीया बीमा राशि के अनुपात में ही एक प्रतिशत प्रति दिन रूम रेंट के अलावा डॉक्टर एवं सर्जन फीस इत्यादि दावो का कम से कम भुगतान बीमा राशि के अनुपात में ही करती हैं। इसलिए अस्पताल में रूम का निर्धारण हमारी बीमा राशि को देखकर करना चाहिए। अस्पताल में भर्ती होने से तीस दिन पहले के सभी खर्चे के साथ डॉक्टर के परामर्श शुल्क और छुट्टी लेने के ६० दिन तक की दवाई बिल इत्यादि का खर्च का भुगतान भी किया जाता हैं ।
क्लेम कैसे करे: अस्पताल में भरती होने की सूचना तुरंत चौबिश घंटे के अन्दर हस्तलिखित सूचना परिवार के सदस्यों द्वारा बीमा कम्पनी अथवा टी पी ए को फेक्स द्वारा भेज कर कन्फर्म कर लेना चाहिए की सूचना मिली की नहीं और अगर मिल गई हो तो क्लेम फॉर्म भेजने की मांग करनी चाहिए ।सूचना में पोलिसी नम्बर, रोगी एवं अस्पताल का नाम पता और संपर्क नंबर सहित भरती होने का कारण और दिनांक समय की समूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए ।
कागजात सही लगाएं: क्लेम फॉर्म के साथ वर्तमान पॉलिसि कोपी के अलावा तमाम ओरिजनल हॉस्पिटल बिल और पेमेंट रसीद , मेडिकल स्टोर बिल डोक्टर द्वारा लिखी गई प्रिस्क्रिप्सन सहित , मेडिकल रिपोर्ट्स और उसके बिल, इनडोअर केसपेपर फोटोस्टेट कोपी हॉस्पिटल अथोरिटी द्वारा सत्यापित डॉक्यूमेंट लगाने होते हैं। जान लें कि बीमा कंपनी में बिल और दूसरे दस्तावेजों की फोटोस्टेट कॉपी या डुप्लीकेट कॉपी स्वीकार नहीं की जाती है अपने रेकोर्ड के लिए एक सेट सम्पूर्ण फोटोस्टेट कॉपी जरुर रखे रहे । ज्यादातर कंपनियां अस्पताल भर्ती होने के 60 दिनों के अंदर किए गए दावे को स्वीकार करती हैं। कुछ कंपनियों ने दावे के फॉर्म के साथ मेडिकल प्रेक्टिशनर सर्टिफिकेट और प्रिस्किप्शन लगाना भी जरूरी कर दिया है। इस तरह की सभी जानकारियां पॉलिसी दस्तावेजों में उपलब्ध होती हैं। इसके बारे में आप कंपनी के अभिकर्ता या किसी अधिकारी से जानकारी ले सकते हैं। ध्यान रहे बीमा अभिकर्ता आपकी मेडिक्लेम पोलिसी को समय पर रेनेवल कराने में सहायता करता हैं और आपका सहयोग ही दावे की प्रक्रिया में सलाहकार के रूप सहयोगी बनता हैं । वैसे दावो के निपटान भुगतान की तमाम जिम्मेदारी टीपीए एवं बीमा कंपनी की रहती हैं।