पुराने ज़माने में हमारे देश के अधिकतर गाँव अथवा शहरों में लोग अपनी जरुरत
की वस्तु सामग्री इत्यादि को खरीदने के लिए चीजो का आदान प्रदान करते जिसे
बार्टर सिस्टम कहा जाता जिसमे अपनी जरुरत की वस्तु लेने के बदले में हमारे
पास जो चीज होती वह सामने वाले को देते थे, जिसके पास देने के लिए कोई
वस्तु नहीं होती थी उसको मुद्रा के रूप में सोना मोहर देनी पड़ती थी । यह
बात आज हमें भले ही पुराने ज़माने की लग रही हैं परन्तु हकीकत में तो आज
भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही प्रक्रिया आयात निर्यात में चल रही हैं ।
आज हमारा देश डीजल-पेट्रोल और सोने का आयात करने वाला दुनिया के बड़े
आयातकों में से एक हैं और बदले में हमारे पास अगर देने के लिए दूसरी और कोई
वस्तु निर्यात के लिए नहीं हैं तब तो हमारे देश की आर्थिक स्थिति का कमजोर
होना स्वाभाविक हैं। माना की डीजल-पेट्रोल हमारे रोज की जरुरत का हिस्सा
हैं लेकिन सोना खरीदना हमारी कौनसी मज़बूरी हैं जिसके चलते सरकार को फिस्कल
डेफिसिट जैसे घाटे का सामना करना पड़ रहा हैं । डीजल-पेट्रोल में भाव
वृद्धि के चलते देश की आम जनता वैसे ही परेशान हैं और ऊपर से सोने का भारी
आयात देश की आर्थिक व्यवस्था को कमजोर कर रहा हैं ।
डीजल
की बिक्री पर सरकारी तेल कंपनियों को हो रहे घाटे की भरपाई के लिए इसकी
कीमतें हर महीने 40 से 50 पैसे प्रति लीटर बढ़ाई जाएंगी। देश में
पेट्रोलियम इंधनों में सबसे ज्यादा खपत डीजल की ही होती है। पेट्रोलियम मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने कहा, 'आगे किसी
अन्य आदेश तक तेल विपणन कंपनियां डीजल के दामों में हर महीने 40-50 पैसे
प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर सकती हैं। 'सरकार ने डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला 17
जनवरी को ही ले लिया था। इस फैसले के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल
कंपनियों को डीजल की कीमतों में तब तक प्रतिमाह थोड़ी थोड़ी वृद्धि करने की
छूट दी गई है जब तक कि उनका घाटा पूरा न हो जाए। फिलहाल डीजल पर उन्हें
आयात मूल्य के हिसाब से 10.80 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।
तेल
कंपनियों ने 17 जनवरी को प्रति लीटर डीलर में 45 पैसे की बढ़ोतरी की
थी। दिल्ली में उस समय डीजल का भाव 47.65 रुपये प्रति लीटर हो गया था ।
इसके
साथ ही थोक ग्राहकों के लिए मूल्य वृद्धि दस रुपये प्रति लीटर की वृद्धि
हो गई है। मोइली ने बताया कि डीजल की कीमतों में प्रति माह मामूली बढ़ोतरी
करने का फैसला अगला आदेश जारी होने तक लागू रहेगा। हालांकि उन्होंने यह
नहीं बताया कि तेल कंपनियां दोबारा कब डीजल की
कीमतें बढ़ाएंगी। डीजल का दाम बढ़ाने के इस कदम से सरकार द्वारा दी जाने
वाली सब्सिडी करीब 12,907 करोड़ रुपये सालाना की बचत होगी। पर कुछ थोक
ग्राहकों ने पेट्रोल पंपों से खुदरा ग्राहकों की तरह डीजल खरीदने का फैसला
लिया है। गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने
कहा है कि उनके राज्य सड़क परिवहन निगम अब डीजल थोक में खरीदने के बजाय
अपनी बसों के लिए तेल स्थानीय पेट्रोल पंपों से खरीदेंगे। फिलहाल ये निगम
अपने निजी उपयोग के लिए सीधे तेल कंपनियों से ईंधन खरीदते हैं। पेट्रोलियम
मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने कहा, बसों को
पेट्रोलपंप से डीजल भरवाने के निर्देश देने के बजाय राज्य सरकारों को डीजल
पर वैट और सेल्स टैक्स कम करने को कहा ताकि वह सस्ता हो सके।
रुपये
में मजबूती और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट के कारण
घरेलू बाजार में भी सोना आखिरकार 30,000 रुपये से नीचे आ गया। पिछले साल
21 जुलाई के करीब 6 महीने बाद सोने की कीमतें इस स्तर से नीचे आई हैं। सोना
विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सोने में अभी और गिरावट हो सकती है। चांदी भी
60,000 रुपये किलो से कम पर चल रही है। पिछले एक महीने में घरेलू बाजार में
सोने की कीमतें अपने उच्चतम स्तर से करीब पांच फीसदी घट गई हैं। हालांकि
शादी-ब्याह का मौसम शुरू हो गया है मगर और आयात शुल्क बढ़ाने की
आशंकाओं के बीच खरीदार दूर रहे। आयातकों ने भी अपनी खरीद धीमी कर ली।
एमसीएक्स में सोना फरवरी अनुबंध में सोने की कीमतें गिरकर 29226 रुपये
प्रति 10 ग्राम रह गईं हालांकि किसी और अनुबंध की कीमतें 30 हजार के नीचे
नहीं आ सकी हैं। इस अनुबंध में गिरावट की वजह इसकी एक्सपायरी डेट होना माना
जा रहा है। सोना अप्रैल वायदा 18 रुपए बढ़कर 30598 रुपये, जून वायदा 20
रुपये बढ़कर 31063 रुपये और अगस्त वायदा 32 रुपये बढ़कर 31492 रुपये पर बंद
हुआ। चांदी मार्च 57869 रुपए, चांदी मई 59230 रुपये और चांदी जुलाई वायदा
60603 रुपए पर है। मुंबई हाजिर बाजार में प्रति 10 ग्राम सोने की कीमत
30240 रुपये थी। घरेलू वायदा बाजार में पिछले साल 26 नवंबर को सोना 32,369
रुपये और हाजिर
बाजार में 32 हजार रुपये तक पहुंच गया था लेकिन इसके बाद स लगातार गिरावट आ
रही है। इसकी प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में नरमी
को माना जा रहा है। 23 नवंबर को सोना 1751.40 डॉलर प्रति औंस था जो एक
फरवरी को गिरकर 1665.50 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। इस बीच रुपये की
कीमत में भी 4.5 फीसदी का सुधार हुआ है। वायदा में फरवरी अनुबंध को छोड़कर
चालू अनुबंधों
में सोने की कीमत अभी भी 30600 रुपये के आस पास है। मगर इनमें हजार रुपये
तक की गिरावट मुमकिन है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये
में मजबूती अथवा कमजोरी, डीजल-पेट्रोल के दाम,सोने का आयात एवं महंगाई आदि
समस्याओ का सीधा असर हमारे देश की युवा पीढ़ी पर पड़ रहा हैं क्योकि भविष्य
में अपनी रिटायर्मेंट लाइफ को जीने के लिए और अपनी ओल्ड एज हेल्थ केयर को
लेकर भारी समस्या का सामना करना पड़ सकता हैं । अब तक लोगो ने इस बारे में
कोई प्लानिंग नहीं भी करी तो भी सब कुछ सस्ता होने के कारण जैसे तैसे अपनी
जिंदगी जी लिए लेकिन भविष्य में यह महंगाई अगर छ: प्रतिशत प्रति वर्ष की दर
से भी बढती हैं तो आज जो जरुरी सामग्री दस हजार रुपैये में मिलती हैं वह
बतीश साल बाद 64500/- रुपिये में मिलेगी । इन सब जरूरतों के लिए सरकार पर
अपनी जिम्मेदारी छोड़कर बैठ जाना या सिर्फ सरकार को ही जिम्मेदार ठहराना
उचित नहीं होगा क्योंकि पब्लिक से सरकार चलती हैं, सरकार का काम देश की
कानून व्यवस्था संभालना हैं इसीलिए कहा जाता हैं लोकतंत्र में जनता की
ताकात ही सबसे बड़ी ताक़त हैं ।

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