आपकी जेब में रखा हुआ मेडिक्लेम का कार्ड कहीं सिर्फ दिखावा भर न साबित हो। हो सकता है, जब आपको इसकी जरूरत पड़े, तब आपको बीमा कंपनी क्लेम ही न दे। हकीकत में जिस तेजी से हेल्थ इंश्योरेंस का चलन बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से दावे खारिज होने का औसत भी बढ़ रहा है। लगातार ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, जिसमें बीमा कंपनियां क्लेम का भुगतान नहीं करती हैं। ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पॉलिसीधारक बीमा कराने के बाद खुद को निशिंचत समझता है। पर उसे हकीकत का अंदाजा तब होता है, जब बीमारी सामने आती है और वो अस्पताल में भर्ती होता है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें पॉलिसीधारक बड़ी उम्मीद से भर्ती होता है। पर जैसे ही उसके केस को टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) के पास भेजा जाता है, उसका दावा खारिज कर दिया जाता है।
सेहत के बार में बताएं: वास्तव में तो मेडिक्लेम का कार्ड सिर्फ एक परिचय पत्र के अलावा और कुछ भी नहीं हैं दावे का भुगतान या केश लेश की सुविधा पोलिसी की वैधता पर निर्भर करती हैं। इसके लिए आपके द्वारा पोलिसी लेते वक्त प्रस्ताव पत्र में दिए गए सवालो के जवाब और रेनेवल चेक के भुगतान की प्रमाणिकता यानि आपकी बैंक पास बुक स्टेटमेंट की कोपी। कई बार ऐसा होता हैं की आप प्रस्ताव पत्र भरते समय जवाब में लिखते हैं मुझे कोई बीमारी पूर्व में नहीं हुई थी पर जब आप हॉस्पिटल में भरती होते हैं तब आप अपने डॉक्टर को अपनी पूर्व बीमारियों का ब्यौरा जरुर लिखवाते हैं ध्यान रहे बीमा कम्पनी और पोलिसीधारक के बीच, आपके द्वारा दिए गए सत्य कथनों पर आधारित एक अनुबंध ही आपकी पोलिसी दस्तावेज हैं। आपको अपनी मेडिकल हिस्ट्री बीमा कंपनी से छिपानी नहीं चाहिए। इसका आगे चलकर बड़ा फायदा मिलता है। ज्यादातर कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी करते वक्त मेडिकल चेकअप को तरजीह नहीं देती हैं। ऐसे में ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप बीमा कंपनी को बता दें कि आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं या फिर आपको फला बीमारी है। आप ये भी कर सकते हैं कि उस कंपनी की ऐसी पॉलिसी खरीदें, जिसमें मेडिकल टेस्ट जरूरी हो।कंपनियों का रवैया ठीक नहीं: जानकार लोगो के मुताबिक बीमा कंपनियों का रवैया हमारे देश में अच्छा नहीं है। हमारे यहां इन चीजों पर कोई ध्यान भी नहीं दे रहा है। दरअसल हेल्थ इंश्योरेंस का कांसेप्ट हमारे यहां पश्चिमी देशों से आया है। वहां ज्यादातर पॉलिसीधारक और बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं। पॉलिसीधारक जहां अपनी पूर्व की बीमारियों का खुलासा कर देते हैं, वहीं बीमा कंपनियां क्लेम को मंजूर करने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रयास करती हैं। पर हमारे यहां अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी किसी भी शख्स को सेहत का बीमा कराने से पहले कुछ बातों को जेहन में रखना चाहिए। सच्चाई को किसी भी सूरत में छिपाना नहीं चाहिए।
भर्ती होना जरूरी : अधिकतर बीमा कंपनियां किसी भी मेडिक्लेम के लिए कम से कम 24 घंटे भर्ती होना जरूरी मानती हैं। परन्तु मोतिया बिंदु, हर्निया, एपेंड़ेक्स, हैड्रोसिल,स्टोन रेमोवल,पाइल्स, कोरोनरी एन्जिओग्राफी एन्जिओप्लासटी आदि बहुतसी सर्जरी चिकित्सा जिसमे अनावश्यक 24 घंटे भरती रहना जरुरी नहीं हैं इसके लिए बिमा कंपनी एवं टी पी ए द्वारा अथवा पालिसी दस्तावेज में दर्ज चिकित्सा सूचि को देखना जरुरी हैं । अगर पॉलिसीधारक पॉलिसी खरीदने के शुरुआती 30 दिनों में आकस्मिक दुर्घटना के अलावा किसी अन्य बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होता है तो होने वाले खर्च के लिए बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी। इसके साथ ही पहले से चली आ रही बीमारियों का खर्च भी बीमा कंपनियां नहीं उठाती हैं। हालांकि कुछ सर्जिकल बीमारियां पॉलिसी लेने के दो और चार साल बाद कवर की जाती हैं।
बीमा राशि: योजना के तहत बीमा कंपनीया बीमा राशि के अनुपात में ही एक प्रतिशत प्रति दिन रूम रेंट के अलावा डॉक्टर एवं सर्जन फीस इत्यादि दावो का कम से कम भुगतान बीमा राशि के अनुपात में ही करती हैं। इसलिए अस्पताल में रूम का निर्धारण हमारी बीमा राशि को देखकर करना चाहिए। अस्पताल में भर्ती होने से तीस दिन पहले के सभी खर्चे के साथ डॉक्टर के परामर्श शुल्क और छुट्टी लेने के ६० दिन तक की दवाई बिल इत्यादि का खर्च का भुगतान भी किया जाता हैं ।
क्लेम कैसे करे: अस्पताल में भरती होने की सूचना तुरंत चौबिश घंटे के अन्दर हस्तलिखित सूचना परिवार के सदस्यों द्वारा बीमा कम्पनी अथवा टी पी ए को फेक्स द्वारा भेज कर कन्फर्म कर लेना चाहिए की सूचना मिली की नहीं और अगर मिल गई हो तो क्लेम फॉर्म भेजने की मांग करनी चाहिए ।सूचना में पोलिसी नम्बर, रोगी एवं अस्पताल का नाम पता और संपर्क नंबर सहित भरती होने का कारण और दिनांक समय की समूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए ।
कागजात सही लगाएं: क्लेम फॉर्म के साथ वर्तमान पॉलिसि कोपी के अलावा तमाम ओरिजनल हॉस्पिटल बिल और पेमेंट रसीद , मेडिकल स्टोर बिल डोक्टर द्वारा लिखी गई प्रिस्क्रिप्सन सहित , मेडिकल रिपोर्ट्स और उसके बिल, इनडोअर केसपेपर फोटोस्टेट कोपी हॉस्पिटल अथोरिटी द्वारा सत्यापित डॉक्यूमेंट लगाने होते हैं। जान लें कि बीमा कंपनी में बिल और दूसरे दस्तावेजों की फोटोस्टेट कॉपी या डुप्लीकेट कॉपी स्वीकार नहीं की जाती है अपने रेकोर्ड के लिए एक सेट सम्पूर्ण फोटोस्टेट कॉपी जरुर रखे रहे । ज्यादातर कंपनियां अस्पताल भर्ती होने के 60 दिनों के अंदर किए गए दावे को स्वीकार करती हैं। कुछ कंपनियों ने दावे के फॉर्म के साथ मेडिकल प्रेक्टिशनर सर्टिफिकेट और प्रिस्किप्शन लगाना भी जरूरी कर दिया है। इस तरह की सभी जानकारियां पॉलिसी दस्तावेजों में उपलब्ध होती हैं। इसके बारे में आप कंपनी के अभिकर्ता या किसी अधिकारी से जानकारी ले सकते हैं। ध्यान रहे बीमा अभिकर्ता आपकी मेडिक्लेम पोलिसी को समय पर रेनेवल कराने में सहायता करता हैं और आपका सहयोग ही दावे की प्रक्रिया में सलाहकार के रूप सहयोगी बनता हैं । वैसे दावो के निपटान भुगतान की तमाम जिम्मेदारी टीपीए एवं बीमा कंपनी की रहती हैं।

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